जनपद-पौड़ी, गढ़वाल में पृथ्वी दिवस-2018 का आयोजन

उत्तराखण्ड राज्य के जनपद पौडी गढ़वाल में ‘पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) भारत सरकार’, नई दिल्ली के उत्प्रेरण एवं वित्तीय सहयोग से उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र (यूसर्क), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, उत्तराखण्ड सरकार, देहरादून द्वारा ‘विश्व पृथ्वी दिवस 2018’ का आयोजन दिनांक 22 अप्रैल 2018 को श्रीनगर गढ़वाल स्थित सरस्वती विद्या मंदिर हाई स्कूल के परिसर में आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य समन्वयक यूसर्क के वैज्ञानिक डा0 ओ0पी0 नौटियाल थे।

कार्यक्रम की शुरूआत में विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री मुकेश मैठाणी जी ने कार्यक्रम में पधारे अतिथियों के स्वागत एवं परिचय से की। कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा के बारे में यूसर्क के वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम के समन्वयक डाॅ. ओम प्रकाश नौटियाल ने उपस्थित छात्र-छात्राओं को विस्तार से बताया। डाॅ. नौटियाल ने पृथ्वी दिवस के आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। डा0 नौटियाल ने कहा कि मनुष्य ने वर्षों से अपने प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन कर उन्हें खतरे के कगार पर ला खड़ा किया है। हमारी लापराही की वजह से ओजोन परत का क्षरण, नदियों की मृत्यु व वैश्विक तापवृद्धि जैसी कई भयावह परेशानियाँ हमारे समक्ष उपस्थित हो गयी है। उन्होंने सभी छात्र-छात्राओं से इस खतरे को समझने व छोटी-छोटी गतिविधियाँ जैसे वृक्ष लगाना, वाहनों का कम प्रयोग, बिजली के उपकरणों का उचित उपयोग जैसे कार्य करने की अपील की।
प्रदूषण पर नियंत्रण के उपाय बताते हुये डा0 नौटियाल ने कहा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए शहरों में परिवहन की नीति में इस तरह परिवर्तन की जरूरत है कि जहरीली गैसें फैलाने वाली परिवहन नीति का उपयोग कम करें एवं ऐसी तकनीकी जो प्रदूषण को कम करती हो बढ़ावा दें। पेट्रोलियम पदार्थों से चलने वाले साधनों एवं सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों में गम्भीरता से काम लेना चाहिए। विकास के नाम पर अगर ऐसी वस्तु उत्पन्न हो रही है जो जहरीली गैसों को बढ़ावा दे रही है तो ऐसे उपयोग पर भी नियंत्रण रखना चाहिए। फैक्ट्रियों एवं प्रयोगशालाओं के आसपास अधिक से अधिक चैड़ी पत्तीदार वृक्ष रोपें जाने चाहिए ताकि वायु प्रदूषण कम हो। रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का प्रयोग भी बहुत सावधानी से एवं सीमत मात्रा में करना चाहिए। जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के बारे में चेतना बढ़ानी चाहिए। सरकार ने हांलाकि पिछले कुछ सालों से प्रदूषण को रोकने के लिए कठोर उपाय किये हैं परन्तु उन उपायों पर अमल करना हम सभी की न केवल जिम्मेदारी है बल्कि समय की मांग है। अगर प्रभावकारी कदम जो सरकार ने लिए, पूरी तरह से लागू हो जाए तो पर्यावरण को संतुलन करने में काफी हद तक मदद्गाार साबित होंगे। सभी से इन सभी तथ्यों में संचेतना की अपील की। उन्होंने दोहराया कि जब लाखों लोग मिलकर जागरूक होगें तो इसके अवश्य ही सुखद परिणाम होगें।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एस.सी भट्ट ने अपने संबोधन में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया जिससे धरती का भी सही संरक्षण हो सके। प्रो. एस.सी भट्ट ने पृथ्वी के अभ्युदय से आज तक पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति में आये परिवर्तनों के विषय में रूपरेखा प्रस्तुत की व मानव द्वारा निर्मित पृथ्वी के पतन के विषय में रोचक तथ्य रखे और लुप्त होती जैव-विविधता के विषय में बताया कि इसका मुख्य कारण बढ़ता हुआ प्रदूषण है। आज प्रदूषण द्वारा पर्यावरण इतना दूषित हो चुका है कि इसके कारण वायुमण्डलीय परिवर्तन आये दिन देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पहाड़ों में दिसम्बर-जनवरी माह में ठण्ड का न पड़ना, बारिश का न होना, नदियों का घटता जल स्तर व पहाड़ों पर मिलने वाला पुष्प बुरांश जो इस वर्ष जनवरी में ही खिल गया हैं, जबकि इसे मार्च-अप्रैल माह में खिलना चाहिए आदि हैं उन्होंने बच्चों को पर्यावरण का व्यापक अर्थ, पर्यावरण का प्रभाव, जीवन में महत्व, प्रदूषण की तेजी से फैलने से पर्यावरण असन्तुलन, कुपोषण के दुष्प्रभाव, जल का संरक्षण, शहरों का कंकरीकरण, गंगा के उद्गम गंगोत्री से गंगासागर तक कई औद्योगिक इकाईयों के द्वारा जल प्रदूषण ‘जलवायु परिवर्तन’ का एक प्रमुख कारण है। प्रो. एस.सी भट्ट ने उत्तराखण्ड में अवस्थित अपार संसाधनों के संरक्षण के साथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात कही।

कार्यक्रम में बोलते हुए यूसर्क के वैज्ञानिक डाॅ. भवतोष शर्मा ने पृथ्वी के संरक्षण हेतु अपने आस-पास के पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने, प्लास्टिक के कम से कम प्रयोग एवं उचित निस्तारण की बात कही। उन्होंने अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने हेतु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों का अल्पतम उपयोग, पुनः उपयोग व पुर्नचक्रण के महत्व पर चर्चा की।
पृथ्वी में जल की स्थिति के विषय में बताते हुये डाॅ. शर्मा ने बताया पृथ्वी में 72 प्रतिशत भाग जल से ढका है। परन्तु उसमें से केवल 3 प्रतिशत जल ही पीने योगय है। समुद्र के अलावा मीठे जल पृथ्वी तक का अधिकतम पानी भी पीने योग्य नहीं है। भारत की अधिकतर नदियों का पानी पीने योग्य नहीं है। केवल उसमें से 30 प्रतिशत ही साफ करके पिया जा सकता है। जल प्रदूषण के कारण पेचिश, खुजली, पीलिया, हैजा आदि बीमारियां बढ़ रही है। वायु का प्रदूषित होना मनुष्य एवं समस्त प्राणियों के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है। वायु प्रदूषण कारखानों, उद्योगों, वृक्षों की कटाई आदि की वजह से दूषित होना अत्यन्त कष्टकारी है, जिसके फलस्वरूप स्वाॅस, टीवी, अस्थमा आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ा है। इराक पर हुई बम वर्षा, यूगोस्लाविया पर आक्रमण एवं इराक के तेल कुओं में आग से कितने टन विषाक्त पदार्थ वायुमण्डल में फैले इसका अनुमान लगाना असम्भव है। वहाँ पर दो तीन बार काले पानी की वर्ष हुई, जिसे एसिड वर्ष भी कहते है। सन् 1952 में लन्दन में काला काहरा पड़ा था जिसमें मौजूद सल्फर डाईआॅक्साइड ने लगभग 4 हजार लोगों के प्राण लिए थे। इसी क्रम में भोपाल की यूनियन कार्बाइड कम्पनी गैस कांड ‘मिक’ गैसों के रिसने से 2500 व्यक्तियों की जहरीली गैस से मृत्यु हो गयी।

हे.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय के डाॅ. मनीष उनियाल ने धरती को हरा-भरा रखने एवं पर्यावरण संरक्षण पर प्रकाश डाला। यूसर्क के श्री ओम जोशी ने यूसर्क के पर्यावरण संबंधी गतिविधियां बताते हुए पर्यावरण संरक्षण मंे तकनीकी के योगदान की बात कही।

कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों के 100 ये अधिक विद्यार्थियों द्वारा प्रतिभाग किया गया। कार्यक्रम के अंत में विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया गया एवं प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।

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